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सोशल मीडिया पर 'सरकार का अंकुश' क्या रोक पाएगा अभिव्यक्ति की आज़ादी को?

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आज कल सोशल मीडिया पर सरकारी नियंत्रण के प्रस्ताव के बारे में पक्ष और विपक्ष में खूब चर्चा हो रही है। इस प्रस्ताव के पक्ष में बोलने वालों का तर्क है कि इससे सोशल मीडिया पर प्रसारित होने वाले द्वेषपूर्ण भाषण (हेट स्पीच), फेक न्यूज़, गैर राष्ट्रवादी गतिविधियों, सार्वजनिक धमकियों व लोगों का ब्रेन वाश करने की गतिविधियों पर अंकुश लगेगा।  वहीं इसका विरोध करने वालो का तर्क है कि सोशल मीडिया पर सरकारी नियंत्रण से नागरिकों का मौलिक अधिकार 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन' होगा साथ ही सरकारी नियंत्रण से गोपनीयता सुरक्षित नहीं रहेगी।  तो सबसे पहली बात कि सोशल मीडिया पर 'सरकार नियंत्रण' नहीं लगा रही। बल्कि का इस पर 'विधि का नियंत्रण' रहेगा। इसलिए 'सरकारी नियंत्रण' टर्म का इस्तेमाल कर गुमराह करने का प्रयास बंद होना चाहिए। दूसरे पिछले काफी समय में हम सभी ने देखा है कि सोशल मीडिया पर बने तमाम फर्जी अकाउंट, पेज व समूहों के माध्यम से पोस्ट की जाने वाली ख़बरें इतनी अस्पष्ट होती हैं कि यह समझ पाना मुश्किल हो जाता है कि कौन सही हैं और कौन फर्जी हैं। सोशल मीडिया पर वायर...

स्टोर रूम में पड़े-कराहते 'ख्वाब' की दास्ताँ

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बचपन में मोबाइल पर आने वाली शायरियों को नोटबुक पर दर्ज करने वाली रूपा अपने किशोरावस्था की ड्योढ़ी पर खड़ी ही हुई थी कि एक रोज कॉलेज की एक वर्कशॉप पर उसकी मुलाकात विजय से हुई। एक दूसरे कॉलेज से वर्कशॉप में हिस्सा लेने आया विजय, रूपा का पहला क्रश बन गया। रूपा पर नोटबुक में दर्ज शायरियों का नशा तारी था, ऐसे में विजय में रूपा को इश्क़ का खुदा नज़र आया। लेकिन संकोचवश वह विजय से बात तक न कर सकी। वर्कशॉप को लगभग तीन महीने गुजर चुके हैं। रूपा की नज़र पर विजय का चेहरा और उसकी सरलता मानों ठहर सी गई है। एक दिन उसके मोबाइल की घंटी बजी, रूपा ने रिसीव किया, उस तरफ से आवाज़ आई 'हेलो रूपा! मैं विजय'।  उफ़ यह क्या! रूपा की जुबान चिपकी रह गई, गले से आवाज ही नहीं निकल रही। उधर से फिर आवाज आई 'रूपा मैं विजय, पहचाना मुझे? हम वर्कशॉप में मिले थे?' रूपा अपने आपे में आते हुए बोली- 'हाँ विजय, कहो कैसे हो? मेरा नंबर कहाँ से मिला?' विजय ने जवाब दिया- कल आपके अतुल सर मिले थे, उन्हीं से मिला। रूपा, क्या हम मिल सकते हैं?' रूपा ने जवाब में 'हाँ' कह दिया। समय और जगह तय हुई। पहली मु...

सरकार और सार्वजनिक हितों पर स्वाहा होते 'लावारिस' जंगल

मुंबई के समीप गोरेगांव स्थित आरे कॉलोनी से जुड़ा 3166 एकड़ में फैला जंगल और उसके लगभग 2,000 से अधिक वृक्ष शुक्रवार रात्रि और शनिवार दिनभर में सरकार व सार्वजनिक हितों पर स्वाहा हो गए। पिछले वर्ष ग्लोबल अर्थ चैंपियन के ख़िताब से सम्मानित होने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक पार्टी बीजेपी के तीनों स्तर की सरकारों के सरमाये में  2,646 वृक्ष काटने के लिए जारी सरकारी आदेश की आड़ में 2,000 से अधिक वृक्ष जमींदोज़ कर दिए गए। पर्यावरण सुरक्षा के लिए सिंगल यूज़्ड प्लास्टिक पर प्रतिबन्ध लगाने व लाखों शौचालयों का निर्माण करने का दावा कर रही केंद्र व राज्य सरकार ने मुंबई को मेट्रो शहर बनाने की धुन में वृक्षों के के 86 प्रजातियुक्त आरे जंगल के 2,646 वृक्षों को लावारिस कटने के लिए छोड़ दिया।  छोटा कश्मीर और नैनीताल कहे जाने वाले आरे के जंगलों की सुरक्षा के लिए जून 2015 में, वनशक्ति और आरे कंजर्वेशन ग्रुप आगे आये थे। दोनों ने मुंबई मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (MMRC) के खिलाफ पुणे में NGT की वेस्टर्न पीठ में एक याचिका दायर की, जिसमें कहा गया कि आरे दुग्ध कॉलोनी के आस पास फैले वन क्षेत्र को...

तुम तब कहाँ थे?

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5 साल, 3 महीना और तकरीबन एक हफ्ते पुरानी सत्ताधारी पार्टी के सिपाही, मोहनदास करमचंद गाँधी की महिमा का खंडन करने के फेर में अपने कथित देशभक्त नाथूराम गोडसे व विनायक दामोदर सावरकर का महिमामंडन करते रहते हैं। दिलचस्प बात यह रहती है कि अपने कथित देशभक्तों के लिए इनके पास कोई कहानी नहीं है इसलिए जिसका अपना गौरवपूर्ण इतिहास रहा है, उस पर ये कीचड़ उछालते रहते हैं। मसलन कभी महात्मा गाँधी को हिन्दू विरोधी बताते हैं तो कभी अय्याश कहने लगते हैं। कभी इनके पास यह भी कहने को होता है कि अगर महात्मा गाँधी चाहते तो वह भगत सिंह की फांसी रुकवा सकते थे।  कट्टर हिंदुत्ववादी पार्टी जिसने हमेशा पूंजीपतियों की जेबें भरी हैं, इन्हें शहीद भगत सिंह की वामपंथी विचारधारा और उनपर मार्क्स-लेनिन का प्रभाव नहीं दिखता क्योंकि वह भगत सिंह को बन्दूक में देखते हैं। भगत सिंह का इस्तेमाल गाँधी की गरिमा को मटियामेट करने के लिए करते हैं। इस तरह बंदूकधारी भगत सिंह को हत्यारे गोडसे के समकक्ष खड़ा करने की कोशिश करते हैं। लेकिन इतिहास बहुत कठोर होता है, वह किसी का पक्ष नहीं लेता इसलिए वह आरएसएस और विहिप जैसों की पोल ख...

'चलो एक बार फिर से सबकुछ 'समय' पर छोड़कर आगे बढ़ जाएं'

ऑटोमोबाइल सेक्टर में मंदी और सरकार का नया मोटर व्हीकल अधिनियम, कोई इत्तेफ़ाक़ तो नहीं लगता! गुरुग्राम में मारुती ने जहाँ बंदी का ऐलान किया है, वहीं मानेसर प्लांट ने भी 2 दिनों में उत्पादन बंद करने के निर्णय लिया है। अब ट्रैफिक चालान की वजह से सड़कों पर या तो गाड़ियां कम दिखेंगी, फिर औसत धनी लोगों की गाड़ियां ही नज़र आएंगी। नई गाड़ियां बिकेंगी नहीं सो वो सड़कों पर दिखेंगी कैसे! और जिसकी नौकरी नहीं बचेगी वह गाड़ी क्या खरीदेगा और पेट्रोल डीजल भरवाएगा कैसे, अगर किसी तरह अपने बचत के रुपयों से दोनों का जुगाड़ कर भी लिया तो ट्रैफिक पुलिस की देनदारी कब तक चुकाता रहेगा?  वैसे मोदी सरकार है बड़ी चतुर! लोगों का ध्यान भरमाया कैसे जाता है, इसे खूब पता है। पहले डीजल पेट्रोल के दाम बढ़ रहे थे, तब बुद्धिजीवियों ने उस पर बखेड़ा खड़ा किया। फिर दाम में रोज घटोतरी और बढ़ोत्तरी की जाती रही लोग इसके आदी हो गए। सोचा होगा कौन एक ही बात पर रोज बोले? दूसरा मुद्दा ढूंढा गया। नोटबंदी और जीएसटी से जी भर गया था तब ये कोई मुद्दा तो रहा नहीं। तलाश डॉलर पर आकर रुकी। रूपये की कीमत नीचे गिर रही है, नीचे गिर रही है, मुख्यमं...

मेरा खुराफाती दिमाग और उसी से उपजा सवाल-

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कल फ्रांस में एक फॉर्मूले को इज़ाद किया। INFRA = In (India)+Fra (France) । खैर वो मोदी हैं, उनके फॉर्मूले वही जानें। लेकिन मेरे खुराफाती दिमाग में उनके INFRA से एक नयी बात ने जन्म लिया। आज भारत के पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली का निधन हो गया है। जेटली अक्सर ही GST, नोटबन्दी जैसे मोदी कार्यकाल के बड़े आर्थिक फैसलों के लिए विपक्षियों व अर्थशास्त्रियों के निशाने पर रहे हैं। आज उनकी मृत्यु के बाद सोशल मीडिया तीन धड़ों में बंटा हुआ है।  कोई उनकी महानता गिना रहा है तो कोई भारत की खस्ता हाल अर्थव्यवस्था के लिए उन्हें दोषी ठहरा रहा है। एक तीसरा धड़ा है जिसे जेटली का कोसा जाना इसलिए बुरा लग रहा है क्योंकि उसे लगता है कि किसी भी व्यक्ति के निधन पर उसे नहीं कोसना चाहिए।  मेरे खुराफाती दिमाग में इसी तीसरे धड़े के लिए जो बात कौंधी वह संयोग से फ्रांस से ही जुड़ी हुई है। जी हाँ.. फ्रांस से। फ्रांस के राजशाही शासन में एक राजा था, जिसे लुई 16वां कहा जाता है। कहा जाता है कि वह एक निरंकुश राजा था। उसकी पत्नी थी, रानी मैरी अंत्वानेत। दोनों ही जबरदस्त खर्चीले राजशाह थे...

चंद्रयान 2 मिशन लांच करने की योग्यता पर भारी पड़ रहा है अंतर्जातीय विवाह का सदमा

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1. कल से फ़ेसबुक पर तमाम पोस्ट देख रही हूँ जिसका कुल मजमून है कि बेटी को पिता की इज्जत नहीं उछालना चाहिए था या कि आपके घर में ऐसा हुआ होता तब भी क्या आप अपनी बेटी का समर्थन करते? तो पहली बात तो यह कि वीडियो जारी करने का कारण जान लिया जाए. मेरा सवाल है - जब जान पर बनी हो, और बकौल साक्षी, उसके पिता व भाई के साथ उनके आदमी उसे ढूंढ रहे हैं और उसके ससुराल पक्ष को धमकियां दी जा रही हैं, शासन-प्रशासन पिता की जेब में हैं, तो वह अपनी बात रखने के लिए कौन सा रास्ता अपनाए? दूसरी बात ये कि अपने घर में ऐसे ही घर की लड़की अन्तर्जातीय विवाह कर के भाग जाए, तब क्या हम उसका समर्थन करते? सीधा सा सवाल है कि आखिर लड़की को भागना ही क्यों पड़ा? तो जवाब यह कि ये भागना दरअसल परिवार और लड़की के बीच की खाईं को जाहिर करता है. एक 23 साल की लड़की जिसका अब तक का जीवन अपने परिवार के बीच बीता है, वह अपने मन की बात अपनी मां तक से नहीं कह पाई तो क्यों? इसलिए क्योंकि उसे इसका नतीजा पहले से ही पता था. वह जानती थी कि ऐसा करने पर या तो उस पर बंदिशें लग सकती हैं या फिर वह ऑनर किलिंग की भेंट चढ़ सकती है. तो घर से भ...

आर्टिकल 15 : फिल्म... 'मजेदार' नहीं थी ...

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किसी फिल्म के धांसू संवादों पर बजने वाली सीटियां व तालियों की गड़गड़ाहट आज पहली बार मन को चुभ रही थीं। अंतिम सीन में अयान रंजन का एक दादी से यह पूछने पर कि 'कौन जात हो?' के बाद ऑडिटोरियम में लगे तेज ठहाकों ने जैसे कानों में दहकते अंगारे रख दिए! बाहर आते दर्शकों के मुंह से जब सुना कि 'फिल्म बड़ी मजेदार थी', लगा फिल्म का उद्देश्य कहीं इसी मजे में खो गया। फिर सोचा हाँ शायद मजेदार ही रही होगी क्योंकि बजबजाते सीवर से निकलने वाले 'उन लोगों' को देखने के हम आदी हो गए हैं। पेड़ से लटकती दो लाशों के आस पास घूमते व खड़े होकर निहारते बच्चों को देखकर हमारा मन नहीं कांपता। एक दृश्य में जहाँ अयान अपने सहयोगियों से उनकी जात पूछ रहे होते हैं उस दृश्य में दर्शक दीर्घा में बैठे लोगों के ठहाके जातिवादी समाज के आदी होने का अहसास करा रहा होता है। फिल्म की शुरुआत में जब अपनी पहली पोस्टिंग पर नियुक्त हुए एएसपी अयान रंजन के स्वागत में आयोजित पार्टी में शराब की चुस्की लेते हुए सवर्ण अयान एक एससी सहयोगी की प्लेट से चखना उठाने को हाथ बढ़ाते हैं और वह अपनी प्लेट हटाते हुए दूसरा लाने को कहता ह...

स्मृति ईरानी के बहाने कुछ अन्य गंभीर मामलों व विपक्ष की नपुंसकता पर एक नज़र

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कल से सोशल मीडिया व मुख्यधारा की मीडिया में अमेठी सांसद स्मृति ईरानी की एक तस्वीर फ़्लैश हो रही है। वह अमेठी में अपने कार्यकर्ता सुरेंद्र सिंह की अर्थी को कांधा दे रही हैं जिसे उनके घर पर आधी रात को किसी से गोली मार दिया था। उत्तर प्रदेश सरकार व पुलिस महकमा सुरेंद्र सिंह व उनके परिवार को जितनी जल्दी हो सके, न्याय दिलाने का भरोसा दिला रहा है। अपने कार्यकर्ता के प्रति अमेठी की सांसद स्मृति ईरानी का यह जुड़ाव वास्तविक है या सिर्फ दिखावा, इसपर बहस को अगर एक किनारे रख दिया जाए तो यह तस्वीर स्मृति ईरानी व भाजपा की छवि को एक सुन्दर कोना देती है।  इस बीच यहीं सोशल मीडिया पर मैंने कई जगह पढ़ा जिसमे रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या व नजीब की गुमशुदगी में स्मृति व भाजपाइयों का हाथ होने पर आलोचना की जा रही है और अमेठी में स्मृति का अपने एक कार्यकर्ता की अर्थी को कांधा देना महज 'सियासी नौटंकी' कहा जा रहा है। अब आते हैं मुद्दे की बात पर! मेरा साफ़ तौर पर मानना है कि रोहित वेमुला और नजीब का मुद्दा 'एक विशेष विश्वविद्यालय' का मुद्दा बनकर रह गया। जिसपर छात्र नेताओं ने अपनी तरफ से भ...

भारतीय मीडिया ! लब आज़ाद हैं या....?

आज विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस है। बोलने और विचार अभिव्यक्ति की आज़ादी के चाहने वालों को इस दिन की ढेर सारी शुभकामनायें!  देश में लोकतंत्र के महापर्व का दौर है, इसी दौर में विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस का आना भी क्या खूब है। एक तरफ भारत के मतदाता अपने पसंदीदा नेता को देश की कमान सौंपने के लिए प्रतिबद्ध है वहीं इस प्रतिबद्धता के निर्माण-निर्णयन में मीडिया की भूमिका सबसे अहम् हो जाती है। यूँ तो हालिया वक़्त में प्रेस के तमाम माध्यम हैं लेकिन बात अगर त्वरित संचार की हो तो टीवी न्यूज़ चैनल और सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया से बेहद आगे है। ऐसे में इन दोनों का यह दायित्व तो बनता ही है कि वे निष्पक्ष, बिना किसी के प्रभाव या दबाव में आये जनता तक सच को पहुंचाए। कमाल की बात यह भी कि इस वर्ष विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस का विषय है- ''चुनाव और लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका'। मीडिया में ऐसा तब तक होता भी रहा जब तक उदारवाद और उसके जरिये पूंजीवाद ने इसे एक समाज सेवा से उद्योग नहीं बना दिया। 1990 के दशक में मीडिया का पूंजीकरण होने से चली यात्रा अब केवल व्यवसाय रह गई है। जहाँ न तो जनहित ...

मैं डरती हूँ

मैं डरती हूँ मैं डरती हूँ घर के छूट जाने से वैसे तो छोड़ा है कई बार घर को इससे पहले कभी पढ़ाई तो कभी करिअर के लिए लेकिन इस बार बात घर छोड़ने की नहीं छूटने की है इस बार घर छूट रहा है क्योंकि मिल गया है अल्टीमेटम आएगा तुम्हें कोई अपने घर ले जाने के लिए मैं डरती हूँ याद आ रहा है जब घर रहने के दौरान जाती थी बाज़ार कहीं दिख गए बड़े भाई को कर लेती फोन और हक़ से मांग लेती पचास रुपये,  अगर घर छूट गया और अगली बार जब घर आऊंगी ऐसे ही बाज़ार में भइया के दिखने पर उनसे पचास रुपए मांग लिए तो डरती हूँ कि वह क्या सोचेंगे! कहीं उन्हें यह न लगे कि उनकी लाडली बहन गुजर रही है आर्थिक तंगी से! मैं डरती हूँ मैं डरती हूँ जब मम्मी-डैडी के बीच हो जाती है कभी कहासुनी तो मैं हक़ से कह दिया करती हूं  चुप हो जाओ दोनों! कैसे बिताए दोनों ने पचास साल एक साथ जवाब में दोनों का कहना कि इसी लिए तो निभी हमारी😊 फिर शर्मा कर मां का नज़रे झुका लेना और डैडी का कन्नी काट कर वहां से हट जाना मैं डरती हूँ कि अगली बार जब दोनों में होगी कहासुनी तो कैसे निभा पाऊँगी मैं अपना फर्ज़ उन्हे...

क्या चुना जाय, सम्मान या संस्कार?

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कभी-कभी जिंदगी में ऐसी जटिल परिस्थिति सामने आ जाती है कि उससे निपटने का रास्ता तो होता है लेकिन पैदाइशी संस्कार ऐसा करने से रोकने लगते हैं. मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही घटा है जिसे इस सोशल मीडिया पर साझा करना चाहती हूँ. इसलिए नहीं कि मेरा विक्टिम कार्ड खेलने जैसा कोई इरादा है बल्कि इसलिए क्योंकि ऐसा करना मुझे जरुरी लगा. जहाँ भी लोकतंत्र है वहां अपनी बात रखने, अपने विचार साझा करने का मौलिक  अधिकार होता है और जहाँ लोकतंत्र नहीं है वहां भी अभिव्यक्ति का अधिकार एक अहम् मानव अधिकार माना जाता है. जैसा कि वोल्टेयर ने कहा भी है कि 'We have a natural right to make use of our pens as of our tongue, at our peril, risk and hazard'. (हम सभी को अपने खतरे, अपने जोखिम और अपनी हिम्मत के बलबूते अपनी कलम और ज़ुबान का इस्तेमाल करने का प्राकृतिक अधिकार है.)  कल मेरी एक फेसबुक पोस्ट पर कभी मेरे गुरु रहे व्यक्ति को बहुत ऐतराज हुआ. वो उस पोस्ट पर आई एक अन्य मित्र की टिप्पणी में घुस आये और मोदी को मेंटर बताने लगे. चूँकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मेरे लिए बहुत मायने रखती है इसलिए उनके विचार पर मुझे कोई र...

फरवरी यानी माह ए मोहब्बत..

फरवरी यानी माह ए मोहब्बत..दुनिया भर के प्रेमियों को इस महीने का इंतज़ार बेसब्री से रहता है. दो प्रेमी अपनी प्रेम की कोपलों के खिलने का ख्वाब सजाए फरवरी के आने का इंतजार करते हैं. भारत में भी इस ख्वाब को आंखों में सजाने वालों की कोई कमी नहीं है. भले ही उनपर लट्ठ बरसे या ताने उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता. मोहब्बत और मोहब्बत के दुश्मनों का वजूद हमेशा से एक साथ चलता आया है. संगीनों के साये में मोहब्बत के जवां होने के किस्सों को कौन नहीं जानता होगा! यूँ तो प्रेम को कई रूपों में बांटा गया है लेकिन प्रेम ने लोगों को  हमेशा से जोड़ने का काम किया है. भारत भले ही खुद के आधुनिक और विकसित होने की गफलत में जी रहा हो लेकिन हकीकत इससे परे है. मेट्रो पॉलिटन शहरों को छोड़ दें (हालांकि अपवाद यहां भी मिल ही जाते हैं) तो दो लोगों के प्रेम को किसी बड़े गुनाह से कमतर नहीं आंका जाता है. हैदराबाद के प्रणय और अमृता की प्रेम कहानी का दुखद अंत भुलाया नहीं जा सकता है. भारत में ऑनर किलिंग की बढ़ती घटनाओं से किसे इंकार होगा! जाति-धर्म और अहम मे बंटे देश में आज़ाद मोहब्बत का ख्वाब पालना चाँद पर उड़कर...

नई-नई परिभाषाएँ गढ़ता धर्म और उसमे से निकलती बदबूदार गंध

न केवल भारत बल्कि दुनिया भर में सबसे ज़्यादा विवादित शब्द है ' धर्म ' . एक समय में कहा जाता था कि ' धर्म ' हर तरह के तर्क से परे है.  यह भी माना जाता रहा कि ' इति धारयेति ' माने जिसे स्वेच्छा से धारण किया जाए वही ' धर्म ' है. अब जैसा कि होता रहा है ' जब किसी चीज या सोच में समय के अनुसार बदलाव न किया जाए वह सड़ने लगती है ', धर्म के साथ भी ऐसा हुआ. ' इति धारयेति ' से एक कदम आगे बढ़कर धर्म ' इति निर्वहति ' यानी जिसका निर्वहन किया जाए , हो गया. जिसे व्यक्ति स्वेच्छा से धारण करता था वही उसे अब दबाव में आकर ढोने को विवश हो गया. आज की भारतीय राजनीति में यही दबाव दिखने लगा है. धर्म जिसे कभी सभी तर्कों से परे माना जाता था , में तर्क घुलने लगा है. जैसे-जैसे तर्क घुले वैसे-वैसे इसमें छिपी बदबूदार गंध बाहर आने लगी. सदियों पुरानी इस बनावट में हाशिये पर जीवन जी रहे समूह के लिए ' ठेंगा ' उघड़ कर साफ़ दिखने लगा है. दलित , अल्पसंख्यक , महिला , कथित अछूत और पिछड़ा वर्ग सभी को धर्म में अपनी जगह शून्य नज़र आने लगी है. तर्क ने कथित धर्मगु...

ये यूपी है, उम्मीदों पर खरी न उतरने वाली सियासत को लात मारकर भगा देना इसकी फितरत है...

तारीख 3 दिसंबर 2018 , जगह बुलंदशहर का स्याना थाना क्षेत्र. दोपहर में तकरीबन 10-11 बजे महाव गांव के एक रेलवे क्रासिंग के पास भीड़ जमा हुई और प्रदर्शन करने लगी. भीड़ के प्रदर्शन का कारण था , पास के जंगल में लगभग 50 गायों के शव का मिलना.  अंदाज़ा लगाया गया कि एक खास संप्रदाय के लोगों ने गोकशी की है और गौ का अपमान कर हिन्दू आस्था को ठेस पहुंचाई है. भीड़ को हिंसक होते देखकर स्याना थाने के SHO यानी स्टेशन हाउस ऑफिसर सुबोध कुमार सिंह अपने दल-बल के साथ भीड़ को शांत करने पहुंचे. भीड़ पहले से ज़्यादा आक्रामक हो गई और फिर वो हुआ जो प्रदेश की सत्ता पर बैठे योगी आदित्यनाथ की कानून व्यवस्था की कलई खोल गया. भीड़ ने सुबोध कुमार सिंह की हत्या कर दी. वायरल वीडियो में जो चेहरा सामने आया वह बजरंग दल के जिला संयोजक योगेश राज का था , जिसपर यह मामला दर्ज किया गया कि वही सुबोध कुमार सिंह का हत्यारा है. इस हिंसक भीड़ में एक और व्यक्ति की जान गई जिसका नाम था ‘ सुमित कुमार ’ . मामले को तूल पकड़ते देख योगी शासन-प्रशासन हरकत में आई और तुरंत आदेश जारी हुआ.   आदेश सुबोध कुमार सिंह या सुमित कुमार की मौत...