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Nav yug: धिक्कार है! तेरे विकार पर

Nav yug: धिक्कार है! तेरे विकार पर : आठ महीने की दुधमुंही बच्ची का बलात्कार! सुनने में ही कितना भयानक है यह ! काश उस आठ महीने की बच्ची ने 6 मीटर की साड़ी लपेट रखी होती तो शाय...

धिक्कार है! तेरे विकार पर

आठ महीने की दुधमुंही बच्ची का बलात्कार! सुनने में ही कितना भयानक है यह ! काश उस आठ महीने की बच्ची ने 6 मीटर की साड़ी लपेट रखी होती तो शायद 28 साल का वह वहशी उसे अपनी बहन ही मान रहा होता! लेकिन 8 महीने की उस बच्ची को क्या जरा सा ख्याल नहीं आया कि किसी के भी सामने किसी भी उम्र में बिना साड़ी या सलवार कमीज के नहीं जाते ! वाह! रे सभ्य समाज ! धिक्कार है तेरी ऐसी वहशियत पर! जहाँ तू एक काल्पनिक किरदार के लिए दंगे करवा सकता है लेकिन असल में बेटियों को सिवाय सेक्स स्लेव के किसी और रूप  में नहीं देख सकता. माफ़ी चाहूंगी, 'सेक्स स्लेव' शब्द को स्पष्ट करना चाहूंगी, नहीं तो तुम्हारी मरी हुई संवेदनाए असंतुलित हो कर नंगा-नाच करना शुरू कर देंगी. 'सेक्स स्लेव' से मेरा मतलब ये है कि आज भी लड़कियों को 'योनि' से ज़्यादा कुछ नहीं समझा जाता है. भले ही लड़कियां चाँद-सूरज तक पहुँच जाएं या कि जेट विमान में उड़ान भर लें, जमीन पर तो वो केवल तुम्हारी दासी ही हैं. तुम्हारी सोच इससे आगे नहीं बढ़ेगी, बढ़ भी नहीं सकती क्योंकि तुम तो आज भी सीता-सावित्री को पूजते हो लेकिन यह कभी नहीं चाहते...

तो क्या लालू के जेल जाते ही ढह जाएगा 2019 का विपक्ष?

2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से न केवल केंद्र बल्कि बीजेपी शासित 19 राज्यों में विपक्ष कोमा अवस्था में है. देश की प्रमुख पार्टियों में से एक कांग्रेस निरंतर नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाले सत्ता पक्ष के खिलाफ एक सशक्त विपक्ष खड़ा करने का प्रयास कर रही है. इस प्रयास में बिहार के सर्वमान्य नेता लालू प्रसाद यादव की भूमिका को सबसे अहम् माना जा रहा था. लेकिन चारा घोटाले में सजायाफ्ता लालू के जेल जाने के बाद विपक्ष की यह उम्मीद अब फिर से दम तोड़ती नज़र आ रही है. हालांकि बार-बार यह कहा जाता रहा है कि लालू के बाद उनकी राजनीतिक विरासत को उनके छोटे पुत्र तेजस्वी यादव सम्हालेंगे. तेजस्वी को लालू की छाया के रूप में प्रदर्शित करने का प्रयास भी किया जाता रहा है. लेकिन इस बात से दरकिनार नहीं किया जा सकता है कि तेजस्वी समेत लालू के पूरे परिवार पर भ्रष्टाचार का केस अदालत में विचाराधीन है. जिसपर फैसला कभी भी आ सकता है. केंद्र की बीजेपी सरकार लालू के अभेद्य किले में सेंध लगा चुकी है. कभी लालू के प्रिय मित्र रहे बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अब बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए के खेमे में जा चुके ...

Nav yug: हितों की लालच में अपनी गरिमा को भूलता भारतीय प्रेस

Nav yug: हितों की लालच में अपनी गरिमा को भूलता भारतीय प्रेस

हितों की लालच में अपनी गरिमा को भूलता भारतीय प्रेस

राष्ट्रीय प्रेस दिवस - 16 नवंबर - भारत में स्वतंत्र और जिम्मेदार प्रेस का प्रतीक है. यह वह दिन था जिस पर प्रेस परिषद ने एक नैतिक निगरानी के रूप में काम करना शुरू किया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि प्रेस ने इस शक्तिशाली माध्यम से अपेक्षाकृत उच्च मानकों को न केवल बनाए रखा बल्कि यह भी कि वह किसी भी बाहरी कारकों के प्रभाव या खतरों से मुग्ध नहीं था. यद्यपि कई प्रेस या मीडिया काउंसिल दुनिया भर में हैं, भारतीय प्रेस परिषद एक अद्वितीय इकाई है- क्योंकि यह एकमात्र संस्था है जो राज्य के उपकरणों के ऊपर भी स्वतंत्रता की रक्षा करने के लिए अपने अधिकारों का इस्तेमाल करती है.                                                                                               - प्रेस कौंसिल ऑफ़ इंडिया.. ऊपर लिखी गई बातें प्रेस कौंसिल ऑफ़ इंडिया की वेबसाइट पर मौजूद ह...

Yes #metoo

बचपन से लेकर  मेरे ग्रेजुएशन फर्स्ट ईयर तक मुझे एक्चुअली में यौन उत्पीड़न होता क्या है, नहीं पता था. हालाँकि इससे पहले कई बार मुझे मेरे आस-पास घटीं  कुछ हरकतें कुछ अटपटी लगीं, पर ऐसी हरकतें यौन उत्पीड़न कहलाती हैं,मुझे कोई आईडिया नहीं था. 12वीं तक मैं गर्ल्स कॉलेज में पढ़ी.पहली बार ग्रेजुएशन की पढ़ाई के लिए को-एड कॉलेज में दाखिला लिया. घर से कॉलेज अक्सर ट्रेन से जाना होता था. फर्स्ट ईयर के दौरान एक दिन मैं अपनी सहेलियों और साथ में जाने वाले कॉलेज के कुछ छात्रों के साथ ट्रेन से वापस घर आ रही थी. समय यही कोई 2 या 3 बजे दोपहर का था. मेरा स्टेशन आने ही वाला था.मैं गेट पर आई तो एक 50-55 साल का व्यक्ति गेट के पास पहले से ही खड़ा था. इससे पहले वह उसी सीट पर बैठा था जहाँ मैं अपनी सहेलियों के साथ बैठी थी. लेकिन स्टेशन आने से पहले वह व्यक्ति गेट पर आकर खड़ा हो गया. जैसे ही मैं गेट पर खड़ी हुई वह पलटा और तेजी से अपना हाथ मेरे गले के निचले हिस्से पर लगभग झटकते हुए आगे बढ़ गया. मैं एकदम से शॉकेड रह गयी! समझ नहीं पाई कि अचानक हुआ क्या! लेकिन चूँकि उसका प्रहार बहुत तेज था जिससे दर्द से मैं तिलमिला...

'गुजरात मॉडल' के दम पर केंद्र में आयी बीजेपी को अब नहीं रहा इस फॉर्मूले पर भरोसा!

संसद के शीतकालीन सत्र की तारीख अब तक नहीं आई है. खबर है कि इस बार का शीतकालीन सत्र को छोटा या फिर पूरी तरह से स्थगित कर दिया जाएगा. दरअसल यह सब इसलिए है क्योंकि जिस वक़्त शीतकालीन सत्र बुलाया जाता है ठीक उसी समय पर देश के दो महत्वपूर्ण राज्यों में चुनाव होने हैं. महत्वपूर्ण इसलिए क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित केंद्र का कैबिनेट हिमाचल प्रदेश और गुजरात में पार्टी के चुनाव प्रचार में व्यस्त हैं. दोनों राज्यों में से गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने चुनाव प्रचार में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है. पार्टी के महासचिव राहुल गाँधी गुजरात में पूरी तरह से चुनाव प्रचार के लिए अपना तम्बू लगा चुके हैं. वहीं पीएम मोदी और भाजपा प्रमुख अमित शाह भी प्रदेश में धुआंधार रैलियां और रोड शो कर रहे हैं. वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में जो बीजेपी गुजरात मॉडल के नाम पर तत्कालीन गुजरात सीएम नरेंद्र मोदी को बतौर प्रधानमंत्री प्रत्याशी प्रोजेक्ट किया और भारी बहुमत से चुनाव जीतकर केंद्र में आयी, उसे ही आज अपने इस फॉर्मूले पर भरोसा नहीं है. शायद इसीलिए अपनी सभाओं में मोदी, अमित शाह और उनके प्रमुख ...

तो क्या ऊंचाहार के एनटीपीसी में हुई महादुर्घटना की पृष्ठभूमि पहले ही लिखी जा चुकी थी ?

ऊंचाहार स्थित एनटीपीसी में बुधवार को दोपहर के खाने के बाद लगभग 3:30 पर जबरदस्त विस्फोट हुआ. एक स्टीम पाइप फटने के कारण संयंत्र में यह विस्फोट हुआ था. प्लांट पूरी तरह से आग की लपटों से घिर गया और गर्म राख 25 से 30 फ़ीट ऊपर हवा में तैर गया. इसी बीच भारी अफरा तफरी में कई मजदूर इस विस्फोट के दबाव में पहले तो हवा में ऊपर उठ गए और दबाव काम होने पर सीधे जमीन पर आ गिरे. फ्लाई ऐश का भारी दबाव उनके शरीर पर आ गिरा जिससे कुछ मजदूरों ने वहीं मौके पर ही दम तोड़ दिया तो कुछ अस्पताल पहुँचने के बाद. सैंकड़ों मजदूर गर्म राख से झुलस गए, जिनमे कइयों की हालत गंभीर बताई जा रही है. हुआ क्या  प्रश्न यह उठता है कि ऐसा आखिर हुआ कैसे? आज इस का भी खुलासा हो गया. सूत्रों की माने बॉयलर के सेफ्टी वॉल्व सोमवार से ही ठीक से काम नहीं कर रहे थे. इसको लेकर टेक्नीशियन ने आगाह भी किया था. वहीं सेफ्टी वॉल्व का चोक होना साफ इशारा है कि किसी भी क्षण कोई बड़ा हादसा हो सकता है. फिर भी प्लांट को चालू रखा गया. घायलों का इलाज लखनऊ के सिविल हॉस्पिटल, केजीएमयू और पीजीआई में चल रहा है. इसके अलावा कुछ घायलों को एयर ...

मत भटकाओ क्योंकि हम भटकने वाले नहीं हैं योगी जी...

योगी ने आज अयोध्या में 1.75 लाख दिये जलाकर गिनीज़ बुक में अपना नाम दर्ज करवा लिया.. वाह क्या बात है, सीना 56 से 156 इंच वाला हो गया होगा योगी जी का... फिलहाल यह वही योगी आदित्यनाथ हैं जिनके गोरखपुर के एक मेडिकल कॉलेज में मासूम इसलिए मर गए क्योंकि इस अस्पताल में ऑक्सीजन नहीं था और ऑक्सीजन इसलिए नहीं था क्योंकि उसके पैसे नहीं चुकाए गए थे.. योगी जी, ये रिकॉर्ड भी आपके ही नाम पर दर्ज है कि गोरखपुर में के सबसे बड़े मंदिर के मठाधीश होने के बावजूद आप गोरखपुर में वर्षों से इंसेफेलाइटिस  से हो रही हज़ारों मौतों को रोक नहीं पाये, उस पर आपका रोना यह रहता है कि क्या करें सरकार ने बजट नहीं मुहैया करवाया ! कमाल है, आप तो वहां से चार बार से सासंद भी रहे, फिर भी आप कुछ नहीं कर सके अब तक! सत्ता में आने के तुरंत बाद से ही राम नाम की रोटियां सेंकना बंद कीजिये आप! और ध्यान दीजिये उन मुद्दों पर जिनके कारण यूपी ने आपको 5 कालिदास मार्ग पहुँचाया है.. या फिर कहीं ऐसा तो नहीं कि ये बारह हज़ार लीटर तेल का अपव्यय कर आप ताज महल के निर्माण में हुए खर्च की कोफ़्त आज की जनता पर उतर रहे हैं! ...

एक और नया साल, पर जारी हैं पुरानी धारणाएं….

वर्ष 2017 अपनी नवीनता की चौखट पार कर चुका है। धीरे-धीरे नए वर्ष पर लिए गए संकल्प अपनी दृढ़ता पर टूटने की कगार पर जा पहुंचे हैं। पांच राज्यों का आगामी चुनाव और उसका यौवन चरम पर है। सभी राजनीतिक दल गुण्डाराज, भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा, अर्थ व्यवस्था में सुधार जैसे बड़े-2 मुद्दों को अपने चुनावी घोषणापत्र में शामिल करने को कटिबद्ध खड़े हैं। वर्ष 2017 अपनी यादें इरादे एवं आगामी वर्ष के लिए कुछ और वादों के साथ तैयार हैं। इस रूमानियत के बीच पहली जनवरी के पदार्पण के तुरंत बाद ही सिलिकन वैली में कुछ ऐसा घटा जिसने इसकी नवीनता पर फिर से प्रश्नचिह्न लगा दिया। हुआ यह कि 31 दिसंबर की रात बेंगलुरू में एम.जी. रोड व ब्रिगेड रोड पर नए साल का जश्न मनाया जा रहा था। तमाम लड़के-लड़कियां इस जश्न में शामिल हुए थे। इसी बीच जश्न में शामिल लड़कियों पर कुछ लड़कों ने फब्तियां कसीं। पहले इन फब्तियों को नज़र अंदाज किया गया। लेकिन जब अभद्रता का स्तर बढ़ गया तो लड़कियों ने लड़कों की इन बद्तमीजियों को रोकने का प्रयास किया। यह प्रयास असफल रहा तब वहां पर तैनात पुलिस कर्मियों जिनमें कुछ महिला पुलिस कर्मी भी थीं से मदद की गुहार की ...

अपने हक पर चुप्पी क्यों?

आज सुबह-सुबह गुंजन ने नाश्ते की टेबल पर आलू का परांठा रखा देखा तो तमतमा गई। लगभग चीखते हुए बोली-"मम्मी कितनी बार कहा है कि मुझे हल्का नाश्ता दिया करो, लेकिन आप जब देखो आलू के पराठे ही बनाकर रख देते हो।" इतना कहकर मुंह बनाते हुए गुंजन कालेज चली गयी। इससे पहले भी वह अपने कपड़ों को लेकर मम्मी पर चिल्ला चुकी थी।  इसी तरह एक दूसर वाकया भी है। सीमा अपनी जीवनशैली और रहन-सहन को लेकर किसी भी तरह का समझौता पसंद नहीं करती थी लेकिन जब उसकी शादी उसके माता-पिता ने कम योग्य लड़के से तय की, तो वह चुप रही। सीमा को जानने वाले सभी लोग सीमा की इस चुप्पी से हैरान थे। हमारे समाज की ये दो तस्वीरें एक प्रकार से आम जीवनचर्या का हिस्सा हैं। दरअसल अपने तौर-तरीकों और पहनावे तथा खान-पान को लेकर बेहद मुखर लड़कियां स्वयं से कम योग्य लड़के से चुपचाप विवाह के लिए हामी भरती हैं तो आश्चर्य होता ही है। विवाह को समाज का स्थायी स्तंभ माना जाता है। कहा भी जाता है कि विवाह ही समाज व विश्व को पीढ़ी दर पीढ़ी एक स्थायी आलंब प्रदान करता है। विवाह नामक इस संस्था को जारी रखने के लिए आवश्यक है कि जिन दो व्यक्तियों के...

यह कलियुग है जहाँ राम नहीं रावण है प्रासंगिक!

पूरा भारत रावण का एक त्यौहार 'विजयदशमी यानी दशहरा' मना रहा है. हाल ही में भारत में हुए बड़े राजनीतिक बदलाव के बाद 'राम-रावण' का सन्दर्भ एक ज्वलंत मुद्दा बन चुका है. हर किसी को यहाँ राम की तलाश है और रावण पर अपना क्रोध जताने वालों की संख्या न तो अँगुलियों पर गिनी जा सकती है और न ही यह संभव है. ऐसे में अगर यह कहा जाए कि आज के दौर में राम से ज़्यादा रावण प्रासंगिक है तो मुमकिन है ऐसा कहने वाला आज के परिवेश में 'राष्ट्रद्रोही' की श्रेणी में रख दिया जाय. फिर भी सत्य और तथ्य को नकारा जाना भी आने वाली पीढ़ी के प्रति किसी बड़े अन्याय से कम नहीं होगा. राम की प्रासंगिकता क्यों समाप्त हो रही है इससे पहले रावण क्यों प्रासंगिक है,इस पर विचार कर लेना आवश्यक है. पहली बात तो यह है कि राम-रावण की कथा त्रेतायुग की है जिसमे जीवन के हर क्षेत्र के मानदंड आज के युग यानी कलियुग से एकदम विपरीत थे. राजतन्त्र में वही राजा सबसे प्रभावशाली माना जाता था जिसने विश्व पर विजय हासिल कर ली हो. रावण ने स्वयं को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए विश्व विजय करने की ठानी जो उस वक़्त के राजनीतिक मान...

अंतर्द्वंद: एक मनःस्थिति

पेन कुछ लिखने से पहले ही थम गई है।  आज तारीख क्या है, एकपल को याद ही नही आया।   निश्चित तो अभी भी नहीं हूँ कि आज कौन सी तारीख मेरे जीवन से कम हुई है।  हंसती हूँ, खिलखिलाती हूँ, सामान्य रहने की हर मुमकिन कोशिश करती हूँ, कुछ हद तक सफल भी हो जाती हूँ, पर कब तक? अंदर से धीरे धीरे खोखली हो रही हूँ। लगता है कि जैसे कुछ भीतर ही भीतर मोम की तरह पिघल रहा है, तपिश भी महसूस कर रही हूँ लेकिन इसका ताप बाहर नहीं आने देती।    त ड़प कर, उलझ कर किसी तरह सुलझने की कोशिश करती हूँ। मन को तो सारी बंदिशों से मुक्त करा चुकी हूँ पर तन को, जो अभी भी मेरे परिवार के ऋणों का बंदी है, उसे कैसे आजाद कराऊँ! बड़े भाई से कुछ दिनों से बहुत नाराज़ हूँ, पर उनकी चिंताएं जो मेरे प्रति हमेशा से रही हैं, उन्होंने जो मेरे लिए किया है वो एक पिता ही अपने बच्चों के लिए कर सकता है, जिनके अहसानों ने मेरी स्वतंत्रता को क़ैद कर रखा है, उससे स्वयं को कैसे उबारु। पिता जी की जागरूक उदासीनता जिस पर अब तनिक भी विश्वास नहीं रहा है, उस पर कैसे मैं स्वयं उदासीन हो जाऊं !  ...

Valentine Day- प्रेम का प्रतीक

फरवरी माह अपनी शुरुआत से ही कथित प्रेम का खुमार लेकर आता है। आशय यह है कि दुनिया भर के प्रेमी अपने अपने प्रेम को को अभिव्यक्त करने के लिए फरवरी माह विशेषकर १४ फरवरी का बेसब्री से इंतज़ार करते हैं। मान्यता है कि वर्षों पूर्व रोमन सम्राट ने संत वेलैंटाइन डे १४ फरवरी कि तारीख को सिर्फ इसलिए सूली पर चढ़ा दिया था क्योंकी संत वेलैंटाइन दो प्रेमियों को उनके प्यार को पाने में साथ दे रहे थे , जिसका तत्कालीन रोमन समाज कड़ा विरोध कर रहा था। ये भी मान्यता है कि तभी से दुनिया भर के प्रेमियों ने १४ फरवरी को संत वेलैंटाइन कि शहादत को प्रेम दिवस के रूप में मानना आरम्भ कर दिया। समय-समय पर सवाल उठता है है कि ये भारत में कब , कैसे, और किसके ज़रिये आया। फिलहाल अभी इसका कोई निश्चित प्रमाण नही मिलता। भारत अपनी सभ्यता, संस्कृति व कथित लोक लाज (मर्यादा) के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इसी लोक लाज को बनाए रखने के लिए कुछ भारतीय विद्वान् वेलैंटाइन डे को 'पश्चिम का ढकोसला व खतरा बताकर इसका विराध करते हैं। कुछ संगठन ' वेलैंटाइन डे' के दिन भारतीय सभ्यता को बचने कि आड़ में तमाम तोड़फोड़ व हिंसात्म...

कुछ अनकहे शब्द, कुछ अनछुई कल्पनाएँ

१- दिल ने कहा कुछ काम कर लूँ , कुछ सुहानी ये शाम कर लूँ । उस दिल के तार बज उठे, लबों पर गीत सज उठे। सब ठीक चल रहा था, लेकिन उसकी ख़ुशी से कोई जल रहा था। वो जलनखोर उसकी ख़ुशी कोई देख न पाया , जाकर अपने जैसों को बुला लाया। सभी ने उजाड़ दिया उसके चमन को, ज़रा सी दया न आई उन बेरहम को। दिल जूझता रहा, कुछ न सूझता रहा। कोई उसके काम न आया, बुलाने पर भी कोई अवतार न आया। क्या कहें बड़ी मुश्किल है, ये जूझने वाला कोई और नहीं मेरा ही दिल है। २- हे मानव, हे ब्रह्मपुत्र ! उठो जागो होश में आओं, अपने रक्त में लौह कि धारा बहाओ इस धरती की करुण पुकार दिल को बींधे जाती है, सोई आँखों को हर पल मींचे जाती है। छाई रहती थी जहाँ शस्यश्यामला आज धुल वहाँ भरी है, राष्ट्र की गरिमा गाथा आज धूमिल पड़ी है। उठा लो अपने हाथों में एक गौरवमयी लेखनी और लिख डालो नयी तक़दीर इसकी, अभी जो धूमिल पड़ी है बना डालो नयी तस्वीर इसकी।

प्राकृतिक दोहन के दुष्परिणाम

विश्वस्तर पर हर एक देश किसी न किसी प्राकृतिक आपदा का शिकार हैं। प्राकृतिक प्रकोपों को बढ़ावा आधुनिकता के चलते ज्यादा है। ग्लाशियारों का पिघलना, कभी अपार बाढ़ कभी सूखा तो कभी कभी विचित्र बीमारियों से कई समस्याएँ बढाती जा रही हैं। आज चाँद पर बसने कि तैयारी करने वाली मानव सभ्यता पृथ्वी पर ही जिस प्रकृति से पोषित है , उसी कि दुर्गति करने पर उतारू है। परिणामतः वह उसी का दुष्परिणाम भुगत भी रहा है। हमारे शास्त्रों - पुराणों एवं वेद ही नहीं विज्ञानं भी स्वीकारता है कि क्षिति- जल-पावक-गगन-समीर यानि पृथ्वी-पानी-अग्नि-आकाश- और वायु जैसे पांच तत्वों से हमारा जीवन है। फिर भी नदियों का प्रदूषण, जंगलों,-वनों की कटान, भूमि, और उत्खनन, वायु तरंगों तक का असीमित दोहन ही नहीं, नाना कारण ऐसे हैं जिन पर ध्यान न देने की वजह से होने वाली प्राकृतिक आपदाएं आती हैं। सच पूछिए तो ये मानवीय क्रूरता का बदला रूप ही हैं जो प्राकृतिक क्रूरता के रूप में सामने आने लगी हैं। पिछले कुछ समय से विश्व के ज़्यादातर देश किसी न किसी प्राकृतिक आपदा से घिरे हुए हैं। कहीं पर बादलों का फटना मुसीबत का कारण बन रहा है, तो कहीं बाढ...

वही ढाक के तीन पात

एक वक्त से भारत में समान लैंगिक अधिकार दिया जाने कि कवायद चल रही है। समान जीवनयापन का अधिकार , समान शिक्षा का अधिकार , समान अवसरों का अधिकार , समांन उत्तराधिकार का अधिकार सहित न जाने कितने ऐसे समान अधिकार हैं जिन्हें लिपिबद्ध किया जाना आसान नहीं हैं। महिलाओं को पुरुषों के समान हक दिलाने की जो गतिविधियाँ चलाई जा रही है , उनमें एक और कवायद जुड़ गयी है "समान अभिभावकत्व के अधिकार की "। इस कानून के तहत जहाँ पहले गोद लिए गए बच्चे पर पहला हक सिर्फ पिता का होता था , वहीँ अब ये अधिकार समान रूप से माँ को भी प्राप्त होगा । ये ईसाईयों , यहूदियों , पारसियों , और मुसलमानों पर लागू होने वाले गार्जियंस एंड वार्ड एक्ट १८९० का संशोधित रूप होगा । संसदीय समिति ( विधि और न्याय ) इस कानून से सम्बंधित सुधार विधेयक का अध्ययन कर रही है। हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम में बेटी को अपने पिता की संपत्ति में बराबर का हक प्राप्त है। फिर भी आश्चर्य है की कानूनन अधिकार होने के बावजूद aaj भी उसे पराया धन कहा जाता है। जीवन भर पिता के घर से भेंट लेते रहने के बदले में उसे पैतृक संपत्ति में बराबर का हक न...

मेघ और वसुधा का संगम

मेघ घिर के आते हैं अपने दोस्तों के संग अपनी वसुधा से फाग खेलने को , नभ से जल गिराते हैं होरी में गोरी को रंग देने को । ठिठोली कर गरजते हैं न मानों तो चमकते हैं , हैं आतुर अपनी सजनी को रंग में भिगोने को । । वसुधा का भी तो क्या कहना , मचलती है देख कर सजना , है भर लेना चाहती वो सारे पलों को अपने आँचल में एक सपना संजोने को । चहकने लगी देखकर होली कि रंगत , प्रीत के रंग में रंग जाने कि है हसरत , दिल ख़ुशी से झूम उठा है पूरा जगत तैयार इनमें खोने को । वसुधा कि ख़ुशी का है नहीं कोई सानी , मेघ की सुन्दर छटा ही है काफी धरती को लुभाने को । नभ में बजने लगी शहनाई देखो मेघ की बारात आई , सभी के होंठों पर है वसुधा की ख़ुशी छाई , मेघ वसुधा का है दिन आज एकाकार होने को । हैं आतुर अपनी सजनी को रंग में भिगोने को । ।

ये जगह नहीं है मेरे काम की .........

इंजीनियर , डॉक्टर , वैज्ञानिक , प्रबंधक , बैंकिंग या फिर शिक्षक बनना हमेशा से ही युवाओं का टशन रहा है । कोई समाजसेवक बन कर जहाँ समाज के हितों के लिए कुछ करना चाहता है तो साथ ही नाम कमाने की ललक भी उनमें जाहिरी तौर पर होती है । जो पढ़ने - लिखने में मेधावी हैं , वो कुछ अपने बल पर तो कुछ धन और सिफारिश का सहारा लेकर अपना मक़सद हासिल कर लिते हैं । लेकिन एक सवाल जो एक अरसे से चला आ रहा है , वो भी राजनीतिक गलियारे से कि क्यों एक कर्मठ और निष्ठावान युवा राजनीति से कोसों दूर रहता है ? क्यों वो नहीं चाहता कि वो भी राजनेता बनकर देश के लिए कुछ करे ? क्यों वो प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनने का ख्वाब नहीं देखता ? इसका जवाब यदि ढूँढा जाय तो जो वजह सामने निकालकर आती है वह है राजनीति में व्याप्त अनाचार , धूर्तता , हैवानियत , और लालच । सत्ता पाने की सनक में न तो कोई रिश्ता देखता है , ना ही किसी अनाचार की परवाह करता है । फिल्मों को समाज का वास्तविक आइना माना जाता है तो २००१ में आई एस शंकर निर्देशित फ़िल्म "नायक : द रियल हीरो " में स्पष्ट दिखाया गया था कि महाराष्ट्र...

ये कैसी चुप्पी ?

भोपाल गैस कांड का वांछित और यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन का मालिक वारेन एंडरसन का अपने गुनाहों से बच निकलना दुर्भाग्य पूर्ण है । साथ ही दुर्भाग्यपूर्ण है , तत्कालीन सरकार का उसके सुरक्षित निकलने का रास्ता साफ़ करना । लाखों लोगों की मौत का ज़िम्मेदार और वर्तमान एवं भविष्य के वातावरण में दूषित गैस रुपी ज़हर घोलने वाला आख़िर क्यों और कैसे तत्कालीन शासन - प्रशासन की दया का पात्र बन गया ? ७ जून , १० को भोपाल की एक अदालत में आये फैसले में वारेन एंडरसन का कहीं नामोनिशान नहीं है । ये कितना दुर्भाग्य पूर्ण है कि जिस कंपनी का पूरा कर्ता - धर्ता ही वारेन था और जो उसी कंपनी में हो रही सुरक्षा गडबडियों को नज़रन्दाज करने का कसूरवार था , वही इतनी बड़ी दुर्घटना के परिणामों से बच गया ! इसके पीछे न्यायिक प्रक्रिया ओं या न्यायाधीशों को जिम्मेवार ठहराना शायद उचित नहीं , क्योंकि अदालत तो सिर्फ धारा , साक्ष्य व गवा...