संदेश

ये जगह नहीं है मेरे काम की .........

इंजीनियर , डॉक्टर , वैज्ञानिक , प्रबंधक , बैंकिंग या फिर शिक्षक बनना हमेशा से ही युवाओं का टशन रहा है । कोई समाजसेवक बन कर जहाँ समाज के हितों के लिए कुछ करना चाहता है तो साथ ही नाम कमाने की ललक भी उनमें जाहिरी तौर पर होती है । जो पढ़ने - लिखने में मेधावी हैं , वो कुछ अपने बल पर तो कुछ धन और सिफारिश का सहारा लेकर अपना मक़सद हासिल कर लिते हैं । लेकिन एक सवाल जो एक अरसे से चला आ रहा है , वो भी राजनीतिक गलियारे से कि क्यों एक कर्मठ और निष्ठावान युवा राजनीति से कोसों दूर रहता है ? क्यों वो नहीं चाहता कि वो भी राजनेता बनकर देश के लिए कुछ करे ? क्यों वो प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनने का ख्वाब नहीं देखता ? इसका जवाब यदि ढूँढा जाय तो जो वजह सामने निकालकर आती है वह है राजनीति में व्याप्त अनाचार , धूर्तता , हैवानियत , और लालच । सत्ता पाने की सनक में न तो कोई रिश्ता देखता है , ना ही किसी अनाचार की परवाह करता है । फिल्मों को समाज का वास्तविक आइना माना जाता है तो २००१ में आई एस शंकर निर्देशित फ़िल्म "नायक : द रियल हीरो " में स्पष्ट दिखाया गया था कि महाराष्ट्र...

ये कैसी चुप्पी ?

भोपाल गैस कांड का वांछित और यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन का मालिक वारेन एंडरसन का अपने गुनाहों से बच निकलना दुर्भाग्य पूर्ण है । साथ ही दुर्भाग्यपूर्ण है , तत्कालीन सरकार का उसके सुरक्षित निकलने का रास्ता साफ़ करना । लाखों लोगों की मौत का ज़िम्मेदार और वर्तमान एवं भविष्य के वातावरण में दूषित गैस रुपी ज़हर घोलने वाला आख़िर क्यों और कैसे तत्कालीन शासन - प्रशासन की दया का पात्र बन गया ? ७ जून , १० को भोपाल की एक अदालत में आये फैसले में वारेन एंडरसन का कहीं नामोनिशान नहीं है । ये कितना दुर्भाग्य पूर्ण है कि जिस कंपनी का पूरा कर्ता - धर्ता ही वारेन था और जो उसी कंपनी में हो रही सुरक्षा गडबडियों को नज़रन्दाज करने का कसूरवार था , वही इतनी बड़ी दुर्घटना के परिणामों से बच गया ! इसके पीछे न्यायिक प्रक्रिया ओं या न्यायाधीशों को जिम्मेवार ठहराना शायद उचित नहीं , क्योंकि अदालत तो सिर्फ धारा , साक्ष्य व गवा...

प्रेम : एक विवादित तथ्य

आज हमारे भारतीय समाज में ग़रीबी, भ्रष्टाचार, भुखमरी, धन का असमान वितरण एवं राजनीतिक उथल-पुथल के अलावा एक और मुद्दा है , जो अपना ज्वलंत रूप धारण कर चुका है। इस मुद्दे का नाम है, " प्रेम की अवधारणा । जी हाँ, सदियों से चला आ रहा ये गतिरोध अब अपनी विकराल स्थिति में आ गया है। " पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ , पंडित हुआ न कोय । ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय॥ " हिंदी जगत के प्रसिद्ध कवि कबीरदास ने भले ही अपने दोहे में लिख दिया हो, किन्तु हमारे समाज के कुछ गणमान्य इसे मानने को तैयार ही नहीं। वेद - पुराणों में जगह - जगह पर प्रेम विवाह का उल्लेख मिलता है , जिनमें कृष्ण - रुक्मिणी , अर्जुन - सुभद्रा , दुष्यंत - शकुंतला आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। आज जो लोग प्रेम विवाह की सार्थकता पर संदेह करते हैं तो निश्चित रूप से वे इन वेद - पुराणों की वास्तविकता पर प्रश्नचिन्ह उठाते हैं। अव्वल तो प्रेम विवाह को नकारा जाता है , और अगर इसे मान्यता मिल भी जाए तो जाति एवं गोत्र पर सवाल उठने लगते हैं। कुछ गणमान्य लोगों का मानना है की विवाह सजातीय तो हों लेकिन सगोत्रीय न हों। ...